Sunday, 23 August 2020

62. कुछ पता नहीं !



कब चढ़ जाये फोटो पर माला,

कुछ पता नहीं !


कब जड़ जाये होठों पर ताला,

कुछ पता नहीं !


कब उजड़ जाये माँग का सिन्दूर,

कुछ पता नहीं !


कब हो जायें पापा बच्चों से दूर,

कुछ पता नहीं !


कब कट जाये राखी-बँधी कलाई,

कुछ पता नहीं !


कब छिन जाये माँ-बाप की लाठी,

कुछ पता नहीं !


बस जीना-मरना है तो वतन की खातिर,

इतना पता है इन्हे !


हँसते-खेलते कब आ जाये बुलावा, 

कुछ पता नहीं ! 

64. दिन और रात

    दिन और रात का एक अजब सा नाता है एक न हो तभी दूसरा आता है   ।   जब आती है रात तो दिन छिप जाता ...