एक माँ को
तो
खोया है मैंने,
पर
दो माँओं को
पाया है;
एक है ‘भूमिका’
दूजी को जग ने
‘कृति’ बुलाया है ।
एक माँ को...
हूँ
तो,
मैं
पिता उनका
पर अब,
उनमें अभिभावक
पाया है ।
उनके रूप में सामने
शायद
पुण्यों का प्रतिफल
आया है ।
एक माँ को...
सभी
बेटों और बेटियों ने
हम सब का मान
बढ़ाया है,
इस
आयु में आकर
अब,
हम पर उनकी
छाया
है ।
करते
हैं अब,
बात ‘कृति’ की,
उसके
जन्मदिन का
त्योहार जो
आया है ;
जन्म से अब तक
सबने पूरे हर्षोल्लास से
मनाया है।
देने के लिए
ये अकिंचन
एक छोटी-सी पोटली
लाया है;
जिसमें,
ढेर-सा
लाड़-दुलार,
और
आशीषों
का अम्बार
समाया
है।
मिलें
उसे,
सुख-समृध्दि
असीम
अपार;
सब
अपनों का
निरंतर
प्यार;
सखा-सहचर
से
अनवरत
साज-श्रृंगार;
और
उसके घर-संसार को
एक
सुंदर-सा विस्तार ।
यही
माँगने को
प्रभु-चरणों
में
अब
ये शीश
नवाया
है ॥
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