Sunday, 19 April 2020

चल रहा है महाभारत



बिछ गयी राजनीति की चौसर,
मिल गया कौरवों को अवसर;
पड़ रहे थे शकुनी के पाँसे,
थम गयी थीं सभी की साँसें ।

हार कर अपना राज-पाट,
और द्रौपदी को दाँव में;
डाल ली पाँचों पाँडवों ने,
बेड़ियाँ स्वयं अपने पाँवों में ।

क्या चौसर खेलना ही था क्षत्रिय-धर्म? 
क्या आवश्यक था यह घोर पाप-कर्म?
क्या राज-सभा में नहीं हुआ था अधर्म?
क्या छुआ था किसी ने द्रौपदी का मर्म?

कैसा अनीति-पूर्ण था वह समाज?
जहाँ चलता ही रहा ऐसा राज-काज,
बचाते रहे सब केवल अपना ताज,
कोई न उठा बचाने एक नारी की लाज ।

आ गये कृष्ण नहीं तो क्या होता?
दुःशासन के दुस्साहस पर जग रोता ।

चौसर के पाँसे लाये विपदा घनेरी,
बज उठी महायुध्द की भीषण रण-भेरी ।
कौरव हो चुके थे अन्याय का पर्याय, 
पाँडवों ने तो केवल माँगा था न्याय ।

महाभारत का युध्द तो होना ही था,
मोह-ग्रस्त धृतराष्ट्र को तो रोना ही था,
दुष्टों को मृत्यु-निद्रा में तो सोना ही था,
धर्म को अधर्म पर विजयी तो होना ही था ।

महाभारत का युध्द तो आज भी है जारी,
पर आज पाँडवों पर कौरव पड़ रहे हैं भारी,
बढ़ गये हैं संसार में अन्यायी और दुराचारी,
काँप उठी है जिनके अधर्म से मानवता सारी ।

हे कृष्ण! 

एक बार जग में फिर से आओ,
हर द्रौपदी की लाज बचाओ,
सबको धर्म का मार्ग दिखाओ,
जग में प्रेम-सुधा बरसाओ॥  

Saturday, 18 April 2020

रावण


स्वर्णपुरी का अधिष्ठाता,
था चारों वेदों का  ज्ञाता;

परम तपस्वी और मनस्वी,
था वह अत्यन्त ही तेजस्वी;

शिव का वह परम उपासक,
था वह बहुत ही वीर शासक;

प्रताप से गूँजा दिग-दिगन्त,
था नहीं उसके शौर्य का अन्त;

परन्तु

निर्लज्ज व्यवहार से,
कुत्सित दुराचार से,
पथभ्रष्ट अहंकार  से,
भीषण अत्याचार से,

तंत्र-मंत्र के दुरुपयोग से,
अंतहीन विलास-भोग से,
पाशविक बल-प्रयोग से,
ग्रह-नक्षत्रों के दुर्योग से,

जब वह गिरा तो पुनः उठ पाया,
दुष्कर्मों ने उसे श्मशान पहुँचाया;
भाग्य ने श्री राम को निमित्त बनाया,
उसे तो उसके "मैं" ने ही मार गिराया

आइये हम इस "मैं" रूपी रावण को मारें,
श्री राम की शरण ले अपना जीवन सुधारें

Monday, 13 April 2020

कुछ अनाम से चेहरे

महायुध्द हो या महामारी
भूकम्प हो या कोई बीमारी,
भूख, गरीबी और बेकारी
पिसती है जनता ही बेचारी

घिर जाते हैं
कुछ अनाम से चेहरे
बिखर जाते हैं
उनके सपने सुनहरे;

वे सपने होते हैं
आने वाले कल के
और उसके
हर एक पल के;

पर,
कहाँ हो पाते हैं
उनके सपने पूरे ?
कुछ हो जाते हैं गुम
कुछ रह जाते अधूरे

उन अनाम से चेहरों को
कोई नहीं पहचानता,
उनका बलिदान
कोई भी है जानता

आइये करें उनका सम्मान
और दें उन्हे उचित स्थान;
ये अनाम से चेहरे ही हैं
सच्चे तौर पर महान ।

Thursday, 9 April 2020

बढ़ता चला जाता हूँ....


दुःसह दुःखों के भार ने,
मुश्किलों के अम्बार ने,
लिये खूब इम्तहान,
किया बहुत परेशान

लोगों की तीख़ी हँसी थी,
बढ़ती सी बेबसी थी,
पर,
खुद झुका, घुटने टेके,
बीते पल मुड़ कर देखे

रास्तों की करी तलाश,
जगा कर अपना विश्वास,
बस,
हिम्मत ने दिया साथ
किस्मत ने थामा हाथ

फिर,
आया एक मोड़,
पाया रोशनी का छोर।
आहिस्ते-आहिस्ते
खुलते गये रास्ते

अब,
गया है,
धूप को सहना
और
तूफाँ से लड़ना

भूल चुका हूँ
सब का छलावा,
पिघल चुका है
मन का लावा

उससे बने गीतों को
गाता-गुनगुनाता हूँ,
और हँसता-मुस्कुराता
बढ़ता चला जाता हूँ


Tuesday, 7 April 2020

भोर


जब,
अचानक अमावस आ जाये,
काली-सी घटा छा जाये,
गहरे घने अँधियारे में
न कोई राह  नज़र आये ।

जीवन में बढ़ जाये संत्रास 
मत छोड़ना तुम अपनी आस,
रखना  मन में ये विश्वास
भोर है कहीं आस ही पास ।

सूर्य का जगमग प्रकाश
करेगा तम का विनाश. 
पक्षियों के मधुर कलरव से
गूँजे उठेगा आकाश ।

सुनहरी भीनी-सी भोर 
लायेगी आशा की डोर,
भर कर तन-मन में उत्साह
बिखेरेगी खुशियाँ चहुँ ओर ॥



Monday, 6 April 2020

ताना-बाना

जीवन का ताना-बाना
बनता है धागों से;
कुछ धागे हैं
रिश्तों के
तो
थोड़े-से ख्वाबों के;
कुछ हैं अहसासों के
और
बाकीअरमानों के।

रिश्तों के धागों में से
कुछ का रंग
पड़ा है कच्चा;
अहसासोंऔरअरमानों में
भरा है
हकीकत का रंग पक्का।


जहाँ,
कच्चे धागों ने किया है
जीवन को कुछ बदरंग;
वहीं
पक्के धागों ने भरा है
जीवन में हर रंग।

जब भी चली
स्वार्थ की कैंची,
विपदा का अंधेरा छाया;
कच्चे धागों ने
तुरन्त ही
अपना रूप दिखाया।

आज पक्के धागे न होते
तो
क्या जीवन बुन पाता;
अहसासों, ख्वाबों
और अरमानों के
धागों से ही तो
ताना-बाना है टिक पाता।।

Saturday, 4 April 2020

आशा का दीप


वो देखो एक लम्बी कतार
खड़ा उसमें वो बेघर, बेकार;
मज़बूर, बेबस और बीमार
मुसीबतों से जूझता हुआ लाचार

पानी उसकी प्यास ही नहीं बुझाता
कभी-कभी तो भूख भी है मिटाता;
गरीबी से जूझता और टकराता
कहीं नहीं है वह ठिकाना पाता

आये भूकम्प, तूफान या महामारी
बाढ़, सूखा, महायुध्द या बीमारी;
परन्तु वही है पिसता, रौंदा जाता
जाने किन पापों का दंड पाता

हज़ारों सालों से बिछती रही है
सियासी शतरंज की बिसात;
किसी की भी हो शह
केवल वही पाता है मात

आओ जलायें,
उसके जीवन में भी एक दीप
लायें सुख-समृध्दि उसके भी समीप

Friday, 3 April 2020

पर्वत से शिक्षा




चलते जाओ तुम निरन्तर
यदि पाना है अपना शिखर 

यदि चलोगे कठिन डगर पर
तभी तो पहुँच पाओगे ऊपर

जितना पहुँचते जाओ ऊपर
भरते जाओ शीतलता अंदर

परन्तु,
रुक मत जाना पा कर शिखर
पर्वत तो अभी फैले हैं चारों ओर

जीवन में आये पर्वतों से
तुम कभी मत घबराना
अपना कर सूझ-बूझ
इन्ही में से मार्ग बनाना

आओ दीपक जलायें.......

आओ दीपक जलायें
तिमिर को भूल जायें ।

आओ दीपक जलायें
महामारी को मार भगायें ।

आओ दीपक जलायें
फिर दीपावली मनायें ।

आओ दीपक जलायें
सबको नयी राह दिखायें ।

आओ दीपक जलायें
आओ दीपक जलायें......

Wednesday, 1 April 2020

उसे क्या कहिये ?



जो मुश्किलों में सही राह दिखाये
उसे क्यों न रहनुमा कहिये ?

जो अस्पतालों में जीवन बचाये
उसे क्यों न फरिश्ता कहिये ?

जो डटा रहे अपने कर्मक्षेत्र में
उसे क्यों न सच्चा इन्सान कहिये ?

जो मिटाये भूख, भूखों की
उसे क्यों न देवता कहिये ?

पर;

जो इबादतगाहों की भीड़ में बाँटें मौत को,
जो मज़हब के नाम पर भड़काये लोगों को,
जो  लालच में करोड़ों के, मारें करोड़ों को,
जो जमाखोरी कर तरसाये लोगों को,
उसे क्यों न सौदागर, मौत का कहिये ?

आइये,बढ़ायें कदम इन्सानियत की ओर
और नेकनीयती से अपनी दमकें चहुँ ओर ॥

राम



मानव-रूप में आते राम
धर्म-आचरण सिखाते राम,
आदर्श-रिश्ते निभाते राम
सत्य-मार्ग दिखाते राम ।

अयोध्या में जन्मे थे राम
जन-जन के मन में थे राम,
मात-पिता के प्यारे थे राम
चारों भाइयों में न्यारे थे राम ।

विश्वामित्र के बालक थे राम
ऋषियों के पालक थे राम,
दानव-संहारक थे राम
अहिल्या के तारक थे राम ।

शिव-धनुष-भंजन करते राम
परशुराम-दर्प-मर्दन करते राम,
जनक-क्षोभ-हरण करते राम
सिय-जयमाल-वरण करते राम ।

पिता के वचन निभाते राम
वन गमन का आदेश पाते राम,
सबको धीर बंधाते राम
सहज वन को जाते राम ।

पर्ण-कुटी बनाते राम
कंद-मूल-फल खाते राम,
सिय का हठ मानते राम
स्वर्ण-मृग के पीछे जाते राम ।

(लौटने पर)
सिय को नहीं पाते राम
शोक-सागर में समाते राम,
वानर-मित्रता अपनाते राम
सुग्रीव को राजा बनाते राम ।

वैदेही-वियोग में व्याकुल थे राम
शुभ-समाचार को आकुल थे राम,
वानरों की कुशल सहेजते राम
हनुमान जी को सुदूर भेजते राम ।

(हनुमान जी से)
सिय का समाचार पाते राम
चरणों से उन्हें उठाते राम,
अपने कंठ से लगाते राम
संग उन्हें बैठाते राम ।

विभीषण को अपनाते राम
सागर पर पुल बँधवाते राम,
सेना को पार लगाते राम
रण  की योजना बनाते राम ।


रावण को युध्द में हराते राम
अधर्म पर विजय पाते राम,
विभीषण को लंकेश बनाते राम
सीता को वापस लाते राम ।

लौट अयोध्या आते राम
जन-नायक बन जाते राम,
आदर्श राज्य चलाते राम
सब पर सुख बरसाते राम ।

काश,
आज भी आ जाते राम
हर मानस में बस जाते राम,
दुःख-दर्द मिटा जाते राम
अमृत-वर्षा कर जाते राम ॥

64. दिन और रात

    दिन और रात का एक अजब सा नाता है एक न हो तभी दूसरा आता है   ।   जब आती है रात तो दिन छिप जाता ...