Wednesday, 29 January 2020

चिरायु भव




तुम्हारे जन्मदिन
की
शुभ-वेला पर
क्या-क्या
दूँ आशीष
तुम्हे ?

मन की है
भावना
कि
मिलता रहे
नीरोग का
वरदान सदा
तुम्हे ।

बना रहे
जग के
सभी कर्तव्यों का
बोध सदा
तुम्हे ।

मिलता रहे
यश और प्रशस्ति
का
पथ सदा
तुम्हे ।

करता हूँ प्रार्थना
कि
मिल जाये
बची-खुची
मेरी आयु भी
तुम्हे ।

Tuesday, 21 January 2020

मैं



मैं
फँसा हूँ
मृगमरीचिकाओं के
जाल में
अपनों की
चाल में,

भावनाओं के
भूचाल में,
बेवजह के
बवाल में।

आहत सा मन,
थका हुआ तन
सूनी डगर,
मंज़िल पर नज़र।

अनबुझी प्यास,
खुशी की तलाश।

शायद कोई मोड़ आए
जो
नया सवेरा लाये
शायद.......
___________

Sunday, 19 January 2020

मिलेगी शायद




स्याह-अँधेरी काली रात,
तेज़ मूसलाधार बरसात,
डरा रहा अंबर का शोर
कड़कती दामिनी चारों ओर ।

तर-बदर बदन,
भीगा-सा  मन
थके-थके पाँव,
ढूँढ रहे छाँव ।

दूर तक फैला मैदान,
बियाबान-सूनसान,
पगडंडी न रस्ता,
बोझ भरा बस्ता ।

कब तक उठेगा मुझसे?

तलाश है

एक ठाँव की,
चाँदनी के गाँव की

मिलेगी शायद .......
____________

शाम सर्दी की




शाम सर्दी की
लगती है उदास सी ।

भरी
ठंढे कुँहासे से,

लदी
घने अंधेरों से,

बढ़ाती
बोझ मन पर,

सुलगाती
अरमानों को,

टँगी  है
कटी पतंग सी ।

स्तब्धता
बन गई है गति
जीवन की ।

बढ़ते अंधेरों के बीच
रोशनी
चौंकाती है,
डराती है ।

सर्दी की शाम
शायद ठहरी है ।

रहने दो
मुझे अब अंधेरों में ही

खोने दो यहीं,
सोने दो यहीं ।

रात तो आनी
अभी बाकी है,

पर
नींद अब आती है,
नींद बहुत आती है ॥
________________

Friday, 17 January 2020

जन्मदिन










आज,
जुड़ रहा है
एक वर्ष नया
तुम्हारे जीवन में।

ये दे रहा 
संदेश नया
तुम्हारे जीवन में।

दूर भगा
निराशा को

ये करेगा,

आशा का
नव-संचार
तुम्हारे जीवन में।

है
सखा-सहचर की 
ये कामना,

मन से निकली 
है भावना

कि

आयें नये त्यौहार,
मिलें ढेरों उपहार,
नाचें खुशियाँ अपार,
और
झूमे बसंत-बहार

तुम्हारे जीवन में ॥

सूर्य


युगों से
प्राणों का
दाता है सूर्य ।

रात के
अंधियारे को
मिटाता है सूर्य ।

ऊषाकाल में
लालिमा
लाता है सूर्य ।

हमें
ऊर्जावान
बनाता है सूर्य ।

सहता है स्वयं का
भीषण ताप वह
पर
जग को
प्रकाश से
नहलाता है सूर्य ।

करता नहीं है
तनिक भी भेदभाव वह
सभी पर
कृपा बरसाता है सूर्य ।

मेघों से आच्छादित
अम्बर का
चीर कर अन्धेरा

ला कर
अपनी रश्मियाँ
बिखराता है सूर्य ।

प्रभु का वरदान है वह,
पावन और महान है वह,
इसीलिये अर्घ्य से
पूजा जाता है सूर्य ।

सूर्य है प्रतीक-

नियमों के
पालन का,


जीवन में
अनुशासन का,

मेघों में भी
न छुपने का,

ऊँचाइयों पर
चमकने का,

अपना ताप
स्वयं सह जाने का
पर
सभी के जीवन को
आलोकित कर जाने का ॥
___________________

बचपन


शाम के धुँधलके में
बहुत याद आता है
वो अपना बचपन ।

बड़े से आँगन में
वो
गहरा सा कुआँ ।

देहरी के पार
चौके में
वो
अंगीठी का धुआँ ।

पाँत में खाना
वो
रस का खजाना ।

गर्मी में
वो
छत पर सोना,
तारों की छाँव में
बिछा
वो
ठंढा बिछौना ।

बारिश में
वो
भीगते हुए भागना
और
भागते हुए
वो
भीगना ।

सर्दी में
वो
अंगीठी का तापना
फिर
रजाई में
वो
दुबकना ।

मेलों में झूले
वो
झूलों की पींगें

मोहल्ले के दोस्तों से
वो
मारी हुई डींगें ।

याद आता है
बहुत याद आता है.......
_________________

कल रात

कल रात सपने में
आये पापा ।
आशीषों का पुलिन्दा
लाये पापा ।

कल रात सपने में ........

पहले लगे,
दूर-बहुत-दूर
फिर
धीरे-धीरे
पास आये पापा;

बादल बन
अमृत छलकाये पापा ।

कल रात सपने में ......

थोड़ा सा मुस्कुराये
फिर

खिलखिलाए पापा;
लगा
सिर भी सहलाये पापा ।

कल रात सपने में ......

सपना?

नहीं, कल रात तो
सच में आये थे पापा ।।
__________________   

मेरे पापा


मेरे पापा थे,

कड़ाकड़ाती ठंढ में
नरम धूप जैसे

या फिर,

आग-बरसाती गर्मी में
रस की फुहार जैसे ।

रहते थे
कितने भी क्लान्त
वे;

दिखते थे
बिल्कुल शान्त
वे ।

भले हो,
माथे पर
पसीने की रेखा

पर

सदा उन्हे
मुस्कुराते ही देखा ।

कभी थामी
नहीं उँगली हमारी
पर
चलना सिखलाया,

नहीं दिये
उपदेश हमें
पर
जीना बतलाया ।

आज बहुत
याद आ रहे हैं
वे;
कैसे उन्हे पाऊँ मैं;

नहीं भी पा पाऊँ
तो
कुछ उन जैसा
बन पाऊँ मैं ॥
_____________

माँ की पाती



उस दिन मिली
पुराने कागज़ों में
माँ की पाती ।

बन गई
मेरे लिये 
अनमोल थाती ।

पाती में थे
मोती से अक्षर
और
उनसे गुँथे हुए
नेह-पगे शब्द ।

सारे शब्द
कुछ देर को 
धुँधला गये,

शायद
आँखों से पानी
छलका गये ।

संजोया था,
पाती में
उनके मन का
दर्द,
चिन्ताएँ
और कुछ उलझन ।

वो उलझनें
सुलझाऊँ
कैसे ?

माँ को अब पाऊँ
कैसे ?

दौड़ रहा हूँ,
भटक रहा हूँ

जीवन के मेले में
उन्हे खोज रहा हूँ ।

रे मन मत हो उदास,

माँ है यहीं कहीं
आस-पास ॥
___________

माँ


माँ,
एक छोटा सा शब्द
पर
कितना गहरा,

छिपाये है अपने अंदर
ममता.भरा
सुन्दर-सा चेहरा ।

माँ
नहीं थीं,
केवल
शरीर,

वो तो थीं
एक
परम-आत्मा।

केन्द्र था
उनके जीवन का
छोटा-सा
हमारा घर-बार,

बसा था
उस में ही
उनका पूरा संसार ।

जीवन-भर की
उनकी पूजा,

दे रही है
जीवनी-शक्ति हमें

उन्होने ही तो
सिखाई थी
प्रभु की भक्ति हमें ।

कैसे मानूँ
कि वे
नहीं हैं
अब यहाँ,

लगता तो है यही
कि
वे हैं यहीं
बिल्कुल यहाँ ॥
_____________

                     

नारी



नारी,
नाम नहीं है
केवल व्यक्ति का,
यह तो प्रतीक है
साधना और शक्ति का ।

नारी,
के मन में
है भरी
प्रेम की भावना
और
समर्पण की कामना ।

नारी है,
पुत्री और भगिनी
माँ और पत्नी
नानी और दादी,
वही है बनाती
आधी आबादी ।

नारी,
धारा जीवन की,
सही दिशा में
है मोड़ती,
चाहे कोई भी
रूप ले
कुलों को
है जोड़ती ।

नारी,
बना रही है
हर क्षेत्र में
नई पहचान,

पंख ले कर
भर रही है
ऊँची उड़ान ।

आओ,
करें नारी का
सम्मान
क्योंकि
वही बढ़ायेगी
हम सब का
मान ॥

खेल जीवन का



लूडो और साँप-सीढ़ी 
मिल कर बनायें
खेल जीवन का,
फेंक कर पासा
ऊपर वाला
निकालता नंबर सभी का ।
किसी को देता 
छः-छः-पाँच
उसकी किस्मत मोटी,
कोई पाता 
दो-तीन-चार
क्योंकि लाया 
किस्मत खोटी ।
गोटी के रंग को ले कर
सब आपस में हैं लड़ते,
एक दूजे की गोटी पीट कर
आगे को हैं बढ़ते ।
कोई सीढ़ी-दर-सीढ़ी 
पा कर
ऊपर चढ़ता जाता

और

किसी को साँप 
काट-काट कर
नीचे पहुँचा जाता ।

यहाँ जुटे हैं सभी
अपनी.अपनी गोटी 
दौड़ाने में

पर 

किसी-किसी का 
जीवन कट जाता
बस अपनी गोट 
बचाने में ।

चाहे बढ़ जाओ आगे
या
रह जाओ पीछे,
यारों पहुँच जाओ ऊपर
या
रह जाओ नीचे ।
अन्त में जातीं सभी गोटियाँँ
एक ही घर के अन्दर,
जीवन और लूडो के खेल में
पाया क्या कुछ अन्तर?
____________________
  
                                                                                                                               

बेटी


मेरे जीवन में,
ले कर
ढेरों रौनक
तू आई,

तुझसे थी घर में
हर खुशी समाई  ।

फिर,
तेरे घर से स्कूल
और
स्कूल से कॉलेज
जाने का
सिलसिला चला ।

समय कब-कहाँ भागा
पता ही नहीं लगा ।

हर जगह बढ़ाया तूने
हमारा मान,
तू बनी
हमारा अभिमान ।

जल्दी ही,
तेरी शादी का
वह दिन भी आया
था जिसमें
ढेरों उल्लास समाया ।

चमकती-दमकती
एक अनमोल रात
धूमधाम से
आ गई बारात ।

जयमाल-फेरों में बीती
सारी रात
और आया
विदा का प्रभात ।

डरता था
इसी वेला से
मैं सदा
क्योंकि
करना था
दिल के टुकड़े को
ख़ुद से जुदा ।

लाल-जोड़े में लिपटी
जब तू
सामने आई थी,
तुझे विदा करने में
आँखों ने
निर्झरी बहाई थी ।

बह रहा था
उस अश्रु-धारा में
एक पिता का
नेह-आशीष-प्यार,
लगा  जैसे
लुट रहा हो
मेरा संसार ।

दूसरे दिन,
जब
हँसती-खिलखिलाती
तू आई थी,
हँसी-ठिठोली के बीच
आँखें फिर भर आई थीं ।

बेटी, कितना है
तेरा अहसान,
कि पा गया हूँ
दामाद के रूप में
एक और संतान ।

अब तेरी खुशियों पर है
सब कुछ वारी ।

तुझसे ही है रोशन
दुनिया हमारी ।

बस,
दिये हुए संस्कार
कभी न भूलना,
दोनो कुलों को
प्यार से जोड़ना ॥
________________

Tuesday, 14 January 2020

मैं और तुम


आज,
मन में आया
कि
तुम पर कुछ लिखूँ।

कुरेदा अतीत को
तो
आया सब कुछ याद,

कैसे मिले थे हम
और
चल पड़े थे साथ।

रास्ते में पाईं
ढेर-सी खुशियाँ,
थोड़े-से गम,
कुछ नाकामियाँ
और
थोड़ी-सी परेशानियाँ।

एक ज़िद थी चलने की
तो
चलते ही रहे.
रुकते-रुकाते,
बतियाते-टकराते।

चलते-चलते
आज कहीं तो पहुँचे हैं हम।

मंज़िल का तो
अभी पता नहीं

सिर्फ हौंसला है
जो
थकने पर भी रुकने नहीं देता।

अब आगे,
क्या है खोना
और
क्या पाना है,
न जाने कब-कहाँ
चलते-चलते
रुक जाना है।

बस, मेरे मीत
जब तक हो सके
निभाना प्रीत,
रहना साथ
और
थामे रखना मेरा हाथ॥

सफरनामा


शुरु हुआ था
ये सफर
इक अर्सा पहले
देखे थे तब
सपने
सुनहरे-रुपहले।

चले जब
जीवन की
पगडंडी पर
तो
मिलती गई
कड़ी धूप
और
घनघोर सर्दी
कभी आँधी-तूफान
कभी घनी-सी बदली।

पर

साथ था तुम्हारा
जिसने रुकने न दिया
मुश्किलों के आगे
झुकने न दिया।

रास्ते-दर-रास्ते
बढ़ चले
साथ तुम्हारे।
मुस्कराते-टकराते
कट गया रस्ता
बतियाते-बतियाते।

हालाँ कि,
सफर है बाकी
और
चलना है काफी

बस,
चलते रहना साथ,

यूँ ही चलते रहना
यूँ ही चलते रहना......

नीड़


बनाया है
बड़ी मेहनत से
मैंने अपना
ये नीड़।

कर इकट्ठा
जीवन में तिनके,
सजाया 
उन्हे चाव से,
बुने
उनमें अरमान
और
बाँधीं
कुछ उम्मीदें।

इस तरह बनाया
मैंने अपना 
ये नीड़।

मिले
थपेड़े आँधियों के,
झोंके तूफानों के,
तपिश लू की,
और
बौछारें बारिशों की

पर बचाया
मैंने सबसे अपना
ये नीड़।

सँजो कर रखी हैं
इसमें
रसद ख्वाबों की,
और
गठरियाँ
धुँधलाती यादों की।

बहुत कीमती हो गया है
अब मेरा
ये नीड़।

बड़ा ही प्यारा है मेरा
ये नीड़।

जगत से न्यारा है मेरा
ये नीड़।

नदी की तरह




बना लो  जीवन अपना
नदी की तरह।

कर लो  मन अपना
नदी की तरह।

पिघला कर बर्फ निकलो
नदी की तरह।

बहते रहो सदा
नदी की तरह।

पी जाओ कलुष सारा
अंदर-बहुत-अंदर
पर
मत हो प्रदूषित
नदी की तरह।

यदि आवे आवेश
 या
बढ़ जाये पानी,
मत तोड़ो किनारे
नदी की तरह।

तेज हो जायें
किरणें सूर्य की
तो
और भी चमको 
नदी की तरह।

रुकोगे तो बनोगे
तालाब जैसे
इसलिये बनाओ
गति को पहचान
नदी की तरह।

अपनाओ रास्ते
टेढ़े या मेढ़े
मिलोगे आखिर
अथाह सागर में ही
नदी की तरह॥

Monday, 13 January 2020

मैं हूँ एक लड़की....


कराया जाता है
अहसास इस बात का
मुझे बचपन से,
सिखाया जाता है
धीमे-से बोलने का सलीका
मुझे बचपन से।

जकड़ती हैं
बेड़ियाँ संस्कारों की
मुझे बचपन से,

सहते जाना है
ताने सभी के
मुझे बचपन से।

क्यों कि
मैं हूँ एक लड़की.....

जीन्स सँकरी न हो,

न हो
स्कर्ट ऊँची

अंदाज़ बिंदास
न लगे
आवाज़ रहे नीची।

क्यों कि
मैं हूँ एक लड़की....

वह है
एक लड़का

हक़ बन गया है
उसका,
जब चाहेगा,
छेड़ जायेगा,
दोस्ती के लिये
बहलायेगा
और
मेरी न नहीं
सुन पायेगा।

ऐसिड के हमले
या
फिर बलात्कार
का
बनना पड़ेगा
शिकार
मुझे

क्योंकि
मैं हूँ एक लड़की....

पर
ले कर
नया सवेरा,
चीर कर
घना अंधेरा,
निकला है
बदला हुआ सूरज।

क्या हुआ यदि
मैं हूँ एक लड़की.....

अब मिलाऊँगी
कदम-ताल
समय के साथ
मैं,
कुछ भी हो जाये
आगे बढ़ती जाऊँगी
मैं।

हो कितना भी
ऊँचा आसमाँ
चीर कर दिखाऊँगी
मैं।

चुन कर
रास्ता ख़ुद का
चलती चली जाऊँगी
मैं।

क्या बिसात
ज़माने की
जो रोक ले
मेरी चाल।

मेरा भरोसा
और
ताक़त
अब
बन चुकी है
मेरी ढाल।

इसलिये
रोको मत
मुझे
टोको मत
मुझे

कि
मैं हूँ एक लड़की.....

तुम्हारी हाँ है ना?




लड़खड़ा  जाऊँ
अगर  कभी
लम्बे सूने
कठिन सफर  में
तो
थाम कर हाथ मेरा
सँभाल लोगे ना?

घबड़ा जाऊँ
अगर कभी
अँधेरों के
घने झुरमुट में
तो
रोशनी के गाँव में
पहुँचा दोगे ना?

फँस जाऊँ
अगर कभी
सर्दी-गर्मी-बरसात
या
आँधी- झंझावात में
तो
दे कर ताकत सहने की
निकाल लोगे ना?

उलझ जाऊँ
अगर कभी
जीवन के बखेड़ों में
या
लहरों के थपेड़ों में
तो
सुझा कर सही राह
सुलझा दोगे ना?

तुम्हारी  हाँ  है  ना?

मेरी नन्ही सी परी


मेरी नन्ही सी परी
अब
थोड़ी-सी बड़ी हो रही है।

छोटे-से पंजों पे
उचक के
आसमाँ को छू रही है।

कहानियाँ
अब
सुनती ही नहीं
बुनती भी है
वो।
(छोटी सी नाक
  पे
बड़ा सा चश्मा चढ़ा के)
लिखती भी है
 वो।

मेरी नन्ही सी परी.....

रुठना भी
उसे अब आ रहा है
उसके
 ख्वाबों का समुंदर
गहरा रहा है।

मैं
 देख पाऊँ या नही

एवरेस्ट से
 ऊँची छलाँग
 लगायेगी वो।

स्टेथेस्कोप लटका के
डॉक्टर
बन जायेगी वो

 या

 अंतरिक्ष
 पर विजय
पायेगी वो।

 जो भी करेगी
 हम सबका आशीष
 ले कर
आगे बहुत आगे
 जायेगी वो॥

वो बूढ़ा बरगद का पेड़




























वो 
बूढ़ा बरगद का पेड़-                            

फैलाये, दूर तक अपनी शाखायें
जमीन से है जुड़ा 
है शान से खड़ा
तने से तना 
है बहुत ही घना ।

वो 
बूढ़ा बरगद का पेड़

सदियों से पूजा जाता, 
सबसे है उसका नाता
सभी को अपनी छाँव में सुलाता ।

वो 
बूढ़ा बरगद का पेड़

क्या तनिक भी झुका है? 
बढ़ने से रुका है?
शरमाया-घबराया है?
या
कभी पछताया है?
वो तो 
और भी हरियाया है ।

वो 
बूढ़ा बरगद का पेड़

मानता है, 
भली भाँति जानता है
कि
दीर्घायु देती है- 
अनुभव का ज्ञान,
मान और सम्मान, 
यह तो है जीवन में
प्रभु का वरदान ।

बूढ़ा हमें बनाता है,
बेवजह का सोचना,
बचपने का खोना, 
सामन्जस्य न होना ।

यदि हम 
फिर से बच्चे बन जायें,
हँसे-खिलखिलायें, 
गीत गुनगुनायें,
कुछ सीखें-सिखायें,
तो
न कभी घबरायेंगे, 
न शर्मायेंगे-पछतायेंगे
बल्कि 
उस बूढ़े बरगद की तरह हरियायेंगे ।

जड़ों को जमीन से जोड़े हुए
और भी परिपक्व हो जायेंगे ।।
........................

इतना आसाँ नहीं.....




इतना आसाँ नहीं 
है मर्द होना


दर्द के बिछौने
पर
सो कर,
चादर ज़िम्मेदारियों की
ओढ़ कर,
नींद के आगोश में
है खोना

इतना आसाँ नहीं....

काँटों की राह
पर 
चल कर,
विपदा की भट्टी में
जल कर,
है जीना

इतना आसाँ नहीं....

देना हो
काँधा अपनों को,
या
करना हो विदा
कलेजे के टुकड़े को,
आँसुओं को
है छुपाना

इतना आसाँ नहीं.....

जलते रहना
सूरज की तरह
सहते जाना,
तपिश को
पर उजाला
है देना

इतना आसाँ नहीं.....

तुम ही


______

हे ईश तुम ही
जगदीश तुम ही
देते हो आशीष तुम ही ।

परम ब्रह्म सुखधाम तुम ही
राम और घनश्याम तुम ही ।

वंदना का हो तार तुम ही
प्राणों का आधार तुम ही ।

देते हो मँझधार तुम ही
करते बेड़ा पार तुम ही ।

साँसों की हो डोर तुम ही
अंधियारे की भोर तुम ही ।

जग के कण-कण में तुम ही
जीवन के पल-पल में तुम ही ।

साँझ और सवेरा तुम ही
सबका रैनबसेरा तुम ही ।

करुणा के सागर हो तुम ही
गिरधर नटवर नागर तुम ही ।
   
बाइबिल और कुरान में तुम ही
बसे हो गीता के ज्ञान में तुम ही ।

ईसा और नानक में तुम ही
जग के पालक हो तुम ही ।

हे करुणासिंधु दया करो
अंतर्मन के द्वंद्व हरो ॥

......................

64. दिन और रात

    दिन और रात का एक अजब सा नाता है एक न हो तभी दूसरा आता है   ।   जब आती है रात तो दिन छिप जाता ...