Sunday, 24 May 2020

आ जाओ न पापा



आज,

आई जो याद

पापा की;

 

तो फूट पड़ी

रुकी हुई 

एक सिसकी।

 

लगा ऐसा

जैसे

बहुत प्यार से

उन्होने बुलाया हो,

 

बैठा कर

अपने पास

बचपन को

फिर से दोहराया हो।

 

आई

कानों में वही आवाज़

चलो,

चॉक-बार खायेंगे

और

तुम्हे अच्छी सी

ड्रेस दिलायेंगे।

 

कर रहा है मन,

फिर से छोटी

हो जाऊँ;

खूब शरारत कर

उन्हे सताऊँ;

उछल-कूद कर

नाचूँ-गाऊँ;

उधम मचा कर

थोड़ी सी डाँट खाऊँ।

 

काश,

एक बार

तो आयें पापा;

देख मुझे सजा-सँवरा

सुख पायें पापा;

सहला कर

माथे को मेरे

मेंह,आशीषों की

बरसायें पापा।

 

एक बार,

बस,

एक बार,

आ जाओ न पापा॥

Friday, 15 May 2020

वो तेरह बरस की लड़की


 

क्या हुआ होगा,

जब

उस तेरह बरस की लड़की

को

कुछ गलीज़ हाथों ने

छुआ होगा,

घसीट कर

पटका होगा,

कपड़ों को

फाड़ा होगा,

मुँह को

दबाया होगा,

चीख को

घोटा होगा,

बदन को

नोचा होगा,

उसका खून

बहाया होगा,

बेहोश करके ही उसे

छोड़ा होगा

 

उस तेरह बरस की लड़की

का

अब क्या होगा?

क्या मौत ही अब

उसका रास्ता होगा?

 

नहीं, बिल्कुल नहीं,

 

उस तेरह बरस की लड़की

को

मरना नहीं

जीना होगा,

ज़हर के इस घूँट को

पीना होगा,

छोड़ अतीत को पीछे,

आगे निकलना होगा,

उठ कर

वेदना के भँवर से,

सतह पर आना होगा

 

बगैर छिपाये

अपना चेहरा 

उन चेहरों को

सामने लाना होगा

 

उस तेरह बरस की लड़की

को

हिम्मत की मिसाल

बनना होगा

और

संजो कर

अपने सपने,

जीवन-पथ पर

चलना होगा

 


64. दिन और रात

    दिन और रात का एक अजब सा नाता है एक न हो तभी दूसरा आता है   ।   जब आती है रात तो दिन छिप जाता ...