Monday, 13 January 2020

इतना आसाँ नहीं.....




इतना आसाँ नहीं 
है मर्द होना


दर्द के बिछौने
पर
सो कर,
चादर ज़िम्मेदारियों की
ओढ़ कर,
नींद के आगोश में
है खोना

इतना आसाँ नहीं....

काँटों की राह
पर 
चल कर,
विपदा की भट्टी में
जल कर,
है जीना

इतना आसाँ नहीं....

देना हो
काँधा अपनों को,
या
करना हो विदा
कलेजे के टुकड़े को,
आँसुओं को
है छुपाना

इतना आसाँ नहीं.....

जलते रहना
सूरज की तरह
सहते जाना,
तपिश को
पर उजाला
है देना

इतना आसाँ नहीं.....

1 comment:

  1. This is my take on being a male person in this age of women's lib. Hope to attract views on this.

    ReplyDelete

64. दिन और रात

    दिन और रात का एक अजब सा नाता है एक न हो तभी दूसरा आता है   ।   जब आती है रात तो दिन छिप जाता ...