है मर्द होना ।
दर्द के बिछौने
पर
सो कर,
चादर ज़िम्मेदारियों की
ओढ़ कर,
नींद के आगोश में
है खोना ।
इतना आसाँ नहीं....
काँटों
की राह
पर
चल कर,
विपदा
की भट्टी में
जल कर,
है जीना ।
इतना आसाँ नहीं....
देना हो
काँधा
अपनों को,
या
करना हो विदा
कलेजे
के टुकड़े को,
आँसुओं
को
है छुपाना
।
इतना आसाँ नहीं.....
जलते रहना
सूरज की तरह
सहते जाना,
तपिश को
पर उजाला
है देना ।
इतना आसाँ नहीं.....

This is my take on being a male person in this age of women's lib. Hope to attract views on this.
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