शाम सर्दी की
लगती है उदास सी ।
भरी
ठंढे कुँहासे से,
लदी
घने अंधेरों से,
बढ़ाती
बोझ मन पर,
सुलगाती
अरमानों को,
टँगी है
कटी पतंग सी ।
स्तब्धता
बन गई है गति
जीवन की ।
बढ़ते अंधेरों के बीच
रोशनी
चौंकाती है,
डराती है ।
सर्दी की शाम
शायद ठहरी है ।
रहने दो
मुझे अब अंधेरों में ही
खोने दो यहीं,
सोने दो यहीं ।
रात तो आनी
अभी बाकी है,
पर
नींद अब आती है,
नींद बहुत आती है ॥
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Some desolate winter evenings fill one with melancholy for no apparent reason in a mysterious way.
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