Sunday, 19 January 2020

शाम सर्दी की




शाम सर्दी की
लगती है उदास सी ।

भरी
ठंढे कुँहासे से,

लदी
घने अंधेरों से,

बढ़ाती
बोझ मन पर,

सुलगाती
अरमानों को,

टँगी  है
कटी पतंग सी ।

स्तब्धता
बन गई है गति
जीवन की ।

बढ़ते अंधेरों के बीच
रोशनी
चौंकाती है,
डराती है ।

सर्दी की शाम
शायद ठहरी है ।

रहने दो
मुझे अब अंधेरों में ही

खोने दो यहीं,
सोने दो यहीं ।

रात तो आनी
अभी बाकी है,

पर
नींद अब आती है,
नींद बहुत आती है ॥
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1 comment:

  1. Some desolate winter evenings fill one with melancholy for no apparent reason in a mysterious way.

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