शाम के धुँधलके में
बहुत याद आता है
वो अपना बचपन ।
बड़े से आँगन में
वो
गहरा सा कुआँ ।
देहरी के पार
चौके में
वो
अंगीठी का धुआँ ।
पाँत में खाना
वो
रस का खजाना ।
गर्मी में
वो
छत पर सोना,
तारों की छाँव में
बिछा
वो
ठंढा बिछौना ।
बारिश में
वो
भीगते हुए भागना
और
भागते हुए
वो
भीगना ।
सर्दी में
वो
अंगीठी का तापना
फिर
रजाई में
वो
दुबकना ।
मेलों में झूले
वो
झूलों की पींगें
मोहल्ले के दोस्तों से
वो
मारी हुई डींगें ।
याद आता है
बहुत याद आता है.......
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Beautifully explains the best part of anyone's life - childhood 😍
ReplyDeleteTaniya