फैलाये, दूर तक अपनी शाखायें
जमीन से है जुड़ा
है शान से खड़ा
तने से तना
है बहुत ही घना ।
वो
बूढ़ा बरगद का पेड़
सदियों से पूजा जाता,
सबसे है उसका नाता
सभी को अपनी छाँव में सुलाता ।
वो
बूढ़ा बरगद का पेड़
क्या तनिक भी झुका है?
बढ़ने से रुका है?
शरमाया-घबराया है?
या
कभी पछताया है?
वो तो
और भी हरियाया है ।
वो
बूढ़ा बरगद का पेड़
मानता है,
भली भाँति जानता है
कि
दीर्घायु देती है-
अनुभव का ज्ञान,
मान और सम्मान,
यह तो है जीवन में
प्रभु का वरदान ।
बूढ़ा हमें बनाता है,
बेवजह का सोचना,
बचपने का खोना,
सामन्जस्य न होना ।
यदि हम
फिर से बच्चे बन जायें,
गीत गुनगुनायें,
कुछ सीखें-सिखायें,
तो
न कभी घबरायेंगे,
न शर्मायेंगे-पछतायेंगे
बल्कि
उस बूढ़े बरगद की तरह हरियायेंगे ।
जड़ों को जमीन से जोड़े हुए
और भी परिपक्व हो जायेंगे ।।
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This is my perception of the so called old age. In my view, age is just a number. Shri Amitabh Bachchan is the best example. Can anybody call him old? I consider him to be the best example of my this poem.
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