लड़खड़ा जाऊँ
अगर कभी
लम्बे सूने
कठिन सफर में
तो
थाम कर हाथ मेरा
सँभाल लोगे ना?
घबड़ा जाऊँ
अगर कभी
अँधेरों के
घने झुरमुट में
तो
रोशनी के गाँव में
पहुँचा दोगे ना?
फँस जाऊँ
अगर कभी
सर्दी-गर्मी-बरसात
या
आँधी- झंझावात में
तो
दे कर ताकत सहने की
निकाल लोगे ना?
उलझ जाऊँ
अगर कभी
जीवन के बखेड़ों में
या
लहरों के थपेड़ों में
तो
सुझा कर सही राह
सुलझा दोगे ना?
तुम्हारी हाँ है ना?

Positive answers of these questions create hope in the unforeseen future.
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