Monday, 13 January 2020

मैं हूँ एक लड़की....


कराया जाता है
अहसास इस बात का
मुझे बचपन से,
सिखाया जाता है
धीमे-से बोलने का सलीका
मुझे बचपन से।

जकड़ती हैं
बेड़ियाँ संस्कारों की
मुझे बचपन से,

सहते जाना है
ताने सभी के
मुझे बचपन से।

क्यों कि
मैं हूँ एक लड़की.....

जीन्स सँकरी न हो,

न हो
स्कर्ट ऊँची

अंदाज़ बिंदास
न लगे
आवाज़ रहे नीची।

क्यों कि
मैं हूँ एक लड़की....

वह है
एक लड़का

हक़ बन गया है
उसका,
जब चाहेगा,
छेड़ जायेगा,
दोस्ती के लिये
बहलायेगा
और
मेरी न नहीं
सुन पायेगा।

ऐसिड के हमले
या
फिर बलात्कार
का
बनना पड़ेगा
शिकार
मुझे

क्योंकि
मैं हूँ एक लड़की....

पर
ले कर
नया सवेरा,
चीर कर
घना अंधेरा,
निकला है
बदला हुआ सूरज।

क्या हुआ यदि
मैं हूँ एक लड़की.....

अब मिलाऊँगी
कदम-ताल
समय के साथ
मैं,
कुछ भी हो जाये
आगे बढ़ती जाऊँगी
मैं।

हो कितना भी
ऊँचा आसमाँ
चीर कर दिखाऊँगी
मैं।

चुन कर
रास्ता ख़ुद का
चलती चली जाऊँगी
मैं।

क्या बिसात
ज़माने की
जो रोक ले
मेरी चाल।

मेरा भरोसा
और
ताक़त
अब
बन चुकी है
मेरी ढाल।

इसलिये
रोको मत
मुझे
टोको मत
मुझे

कि
मैं हूँ एक लड़की.....

1 comment:

  1. This is the reality of a young girl in today's world. Hopefully, she has picked up courage to improve her conditions with her own efforts.

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