Sunday, 19 January 2020

मिलेगी शायद




स्याह-अँधेरी काली रात,
तेज़ मूसलाधार बरसात,
डरा रहा अंबर का शोर
कड़कती दामिनी चारों ओर ।

तर-बदर बदन,
भीगा-सा  मन
थके-थके पाँव,
ढूँढ रहे छाँव ।

दूर तक फैला मैदान,
बियाबान-सूनसान,
पगडंडी न रस्ता,
बोझ भरा बस्ता ।

कब तक उठेगा मुझसे?

तलाश है

एक ठाँव की,
चाँदनी के गाँव की

मिलेगी शायद .......
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