Friday, 17 January 2020

मेरे पापा


मेरे पापा थे,

कड़ाकड़ाती ठंढ में
नरम धूप जैसे

या फिर,

आग-बरसाती गर्मी में
रस की फुहार जैसे ।

रहते थे
कितने भी क्लान्त
वे;

दिखते थे
बिल्कुल शान्त
वे ।

भले हो,
माथे पर
पसीने की रेखा

पर

सदा उन्हे
मुस्कुराते ही देखा ।

कभी थामी
नहीं उँगली हमारी
पर
चलना सिखलाया,

नहीं दिये
उपदेश हमें
पर
जीना बतलाया ।

आज बहुत
याद आ रहे हैं
वे;
कैसे उन्हे पाऊँ मैं;

नहीं भी पा पाऊँ
तो
कुछ उन जैसा
बन पाऊँ मैं ॥
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