मेरे पापा थे,
कड़ाकड़ाती ठंढ में
नरम धूप जैसे
या फिर,
आग-बरसाती गर्मी में
रस की फुहार जैसे ।
रहते थे
कितने भी क्लान्त
वे;
दिखते थे
बिल्कुल शान्त
वे ।
भले हो,
माथे पर
पसीने की रेखा
पर
सदा उन्हे
मुस्कुराते ही देखा ।
कभी थामी
नहीं उँगली हमारी
पर
चलना सिखलाया,
नहीं दिये
उपदेश हमें
पर
जीना बतलाया ।
आज बहुत
याद आ रहे हैं
वे;
कैसे उन्हे पाऊँ मैं;
नहीं भी पा पाऊँ
तो
कुछ उन जैसा
बन पाऊँ मैं ॥
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