Friday, 17 January 2020

माँ की पाती



उस दिन मिली
पुराने कागज़ों में
माँ की पाती ।

बन गई
मेरे लिये 
अनमोल थाती ।

पाती में थे
मोती से अक्षर
और
उनसे गुँथे हुए
नेह-पगे शब्द ।

सारे शब्द
कुछ देर को 
धुँधला गये,

शायद
आँखों से पानी
छलका गये ।

संजोया था,
पाती में
उनके मन का
दर्द,
चिन्ताएँ
और कुछ उलझन ।

वो उलझनें
सुलझाऊँ
कैसे ?

माँ को अब पाऊँ
कैसे ?

दौड़ रहा हूँ,
भटक रहा हूँ

जीवन के मेले में
उन्हे खोज रहा हूँ ।

रे मन मत हो उदास,

माँ है यहीं कहीं
आस-पास ॥
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