उस दिन मिली
पुराने कागज़ों में
माँ की पाती ।
बन गई
मेरे लिये
अनमोल थाती ।
पाती में थे
मोती से अक्षर
और
उनसे गुँथे हुए
नेह-पगे शब्द ।
सारे शब्द
कुछ देर को
धुँधला गये,
शायद
आँखों से पानी
छलका गये ।
संजोया था,
पाती में
उनके मन का
दर्द,
चिन्ताएँ
और कुछ उलझन ।
वो उलझनें
सुलझाऊँ
कैसे ?
माँ को अब पाऊँ
कैसे ?
दौड़ रहा हूँ,
भटक रहा हूँ
जीवन के मेले में
उन्हे खोज रहा हूँ ।
रे मन मत हो उदास,
माँ है यहीं कहीं
आस-पास ॥
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