आज,
मन में आया
कि
तुम पर कुछ लिखूँ।
कुरेदा अतीत को
तो
आया सब कुछ याद,
कैसे मिले थे हम
और
चल पड़े थे साथ।
रास्ते में पाईं
ढेर-सी खुशियाँ,
थोड़े-से गम,
कुछ नाकामियाँ
और
थोड़ी-सी परेशानियाँ।
एक ज़िद थी चलने की
तो
चलते ही रहे.
रुकते-रुकाते,
बतियाते-टकराते।
चलते-चलते
आज कहीं तो पहुँचे हैं हम।
मंज़िल का तो
अभी पता नहीं
सिर्फ हौंसला है
जो
थकने पर भी रुकने नहीं देता।
अब आगे,
क्या है खोना
क्या पाना है,
न जाने कब-कहाँ
चलते-चलते
रुक जाना है।
बस, मेरे मीत
जब तक हो सके
निभाना प्रीत,
रहना साथ
और
थामे रखना मेरा हाथ॥

This is pleasure of long-standing companionship where one can reminisce about the past life.
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