क्यों,
मनाते हैं हमकेवल
एक दिन का
महिला दिवस ?
क्यों,
मानते हैं हम
महिला को
इतना विवश ?
नहीं रह गई है
महिला अब
अबला,
बन गई है
अब वह
सबला ।
रही है
सदा से वह,
मंत्रमयी गायत्री,
यम को हराने वाली
तेजस्विनी सावित्री ।
आज,
नहीं है
वह केवल
माता, पत्नी,
सुता या भगिनी,
न ही है
किसी-भी
पथ की
अंधानुगामिनी ।
नहीं है,
उसे अब
देवी बनना,
न ही अर्धाँगिनी-रूप
में सजना ।
उसकी है
अब
नयी पहचान,
कदमों-तले है
उसके
खुला आसमान ।
क्यों नहीं
बन सकता
ऐसा समाज,
जिसमें
कोई निर्भया
न खोये
लाज ।
तब मनायेंगे
सचमुच का
महिला दिवस,
क्योंकि
तब नहीं होगी
कोई
महिला विवश ।
Happy International Women's Day to all. This is my take about the day in the form of this poem. Hope to get appreciation.
ReplyDeleteHeartfelt emotions expressed thru the poem .
ReplyDeleteThanks a lot.
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