वो,
छाया चौतरफा
होली का रंग,
शोर-शराबा
और हुड़दंग ।
वो,
अबीर और गुलाल का
फैला गुबार,
करता आकाश को
पीला और लाल ।
वो,
पिचकारी से छूटती
पानी की धार,
छतों से बरसती
रंग की बौछार ।
वो,
गुझिया, मालपुआ
और पकवान
रस की खान थे
ये होली की जान ।
वो,
होली के गीत गाती
मस्तानों की टोली,
दोस्तों की बोली में
हँसी-ठिठोली ।
वो,
ढोल की थापों पर
झूमता यौवन,
हर्ष से सराबोर
जन-जन का तन-मन ।
वो होली
तो बस
अब हो-ली ।
अब तो,
होली सिमट गई है,
और
फ़ेसबुक के लाइक्स में;
करोना वायरस से बचाव
और
राजनीति की सफाई में ।
यदि,
रहा यही हाल,
तो
बीतने दो दस साल,
एलेक्सा के बच्चों की टोली
के साथ ही मनेगी
अब सबकी होली ।

Friends,
ReplyDeleteThis is my take on Holi festival of the day and how I see it beyond. We are constantly losing our heritage in the name of modernity.
Let's preserve it with all our might.
Send me your opinion by posting your comments.
Thanks
I have read your poem
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