महायुध्द
हो या महामारी
भूकम्प
हो या कोई बीमारी,
भूख,
गरीबी और बेकारी
पिसती
है जनता ही बेचारी ।
घिर
जाते हैं
कुछ
अनाम से चेहरे
बिखर
जाते हैं
उनके
सपने सुनहरे;
वे
सपने होते हैं
आने
वाले कल के
और
उसके
हर
एक पल के;
पर,
कहाँ
हो पाते हैं
उनके
सपने पूरे ?
कुछ
हो जाते हैं गुम
कुछ
रह जाते अधूरे ।
उन
अनाम से चेहरों को
कोई
नहीं पहचानता,
न
उनका बलिदान
कोई
भी है जानता ।
आइये
करें उनका सम्मान
और
दें उन्हे उचित स्थान;
ये
अनाम से चेहरे ही
हैं
सच्चे
तौर पर महान ।

For millennia, man has faced catastrophes of wars and natural calamities but their worst sufferers have been unknown faces. Nobody sings their paeans but they are the actual heroes. My this poem is a small tribute to them.
ReplyDeleteVery true we do extend our gratitude to them.
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