दुःसह दुःखों के भार ने,
मुश्किलों
के अम्बार ने,
लिये खूब इम्तहान,
किया बहुत परेशान ।
लोगों की तीख़ी हँसी थी,
बढ़ती सी बेबसी थी,
पर,
न खुद झुका, न घुटने टेके,
बीते पल मुड़ कर न देखे ।
रास्तों की करी तलाश,
जगा कर अपना विश्वास,
बस,
हिम्मत ने दिया साथ
किस्मत ने थामा हाथ ।
फिर,
आया एक मोड़,
पाया रोशनी का छोर।
आहिस्ते-आहिस्ते
खुलते गये रास्ते ।
अब,
आ गया है,
धूप को सहना
और
तूफाँ से लड़ना ।
भूल चुका हूँ
सब का छलावा,
पिघल चुका है
मन का लावा ।
उससे बने गीतों को
गाता-गुनगुनाता हूँ,
और हँसता-मुस्कुराता
बढ़ता चला जाता हूँ ॥

It is a poem about grit and determination of a person to march ahead in the face of difficulties.
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