Thursday, 9 April 2020

बढ़ता चला जाता हूँ....


दुःसह दुःखों के भार ने,
मुश्किलों के अम्बार ने,
लिये खूब इम्तहान,
किया बहुत परेशान

लोगों की तीख़ी हँसी थी,
बढ़ती सी बेबसी थी,
पर,
खुद झुका, घुटने टेके,
बीते पल मुड़ कर देखे

रास्तों की करी तलाश,
जगा कर अपना विश्वास,
बस,
हिम्मत ने दिया साथ
किस्मत ने थामा हाथ

फिर,
आया एक मोड़,
पाया रोशनी का छोर।
आहिस्ते-आहिस्ते
खुलते गये रास्ते

अब,
गया है,
धूप को सहना
और
तूफाँ से लड़ना

भूल चुका हूँ
सब का छलावा,
पिघल चुका है
मन का लावा

उससे बने गीतों को
गाता-गुनगुनाता हूँ,
और हँसता-मुस्कुराता
बढ़ता चला जाता हूँ


1 comment:

  1. It is a poem about grit and determination of a person to march ahead in the face of difficulties.

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