स्वर्णपुरी का
अधिष्ठाता,
था चारों
वेदों
का ज्ञाता;
परम तपस्वी
और
मनस्वी,
था वह
अत्यन्त ही तेजस्वी;
शिव का
वह
परम
उपासक,
था वह
बहुत
ही वीर शासक;
प्रताप से
गूँजा
दिग-दिगन्त,
था नहीं
उसके
शौर्य
का
अन्त;
परन्तु
निर्लज्ज व्यवहार
से,
कुत्सित दुराचार
से,
पथभ्रष्ट अहंकार से,
भीषण अत्याचार
से,
तंत्र-मंत्र
के
दुरुपयोग
से,
अंतहीन विलास-भोग
से,
पाशविक बल-प्रयोग
से,
ग्रह-नक्षत्रों
के
दुर्योग
से,
जब वह
गिरा
तो
पुनः
उठ
न
पाया,
दुष्कर्मों ने
उसे
श्मशान
पहुँचाया;
भाग्य ने
श्री
राम
को
निमित्त
बनाया,
उसे तो
उसके
"मैं"
ने
ही
मार
गिराया
।
आइये हम
इस
"मैं"
रूपी
रावण
को
मारें,
श्री राम
की
शरण
ले
अपना
जीवन
सुधारें
॥

For all of you who are watching re-telecast of the serial Ramayana of Ramanand Sagar, today was Dussehra, as mighty Raavan was killed by Lord Rama. I have composed this poem not only to celebrate Dussehra in my own way but also to reiterate that Raavan was a symbol of evil which is present within us in one form or the other. Let's kill this evil.
ReplyDeleteबहुत ही सुंदर प्रस्तुति है श्रीमान आप की ।
ReplyDeleteजय श्री राम
धन्यवाद
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