Saturday, 18 April 2020

रावण


स्वर्णपुरी का अधिष्ठाता,
था चारों वेदों का  ज्ञाता;

परम तपस्वी और मनस्वी,
था वह अत्यन्त ही तेजस्वी;

शिव का वह परम उपासक,
था वह बहुत ही वीर शासक;

प्रताप से गूँजा दिग-दिगन्त,
था नहीं उसके शौर्य का अन्त;

परन्तु

निर्लज्ज व्यवहार से,
कुत्सित दुराचार से,
पथभ्रष्ट अहंकार  से,
भीषण अत्याचार से,

तंत्र-मंत्र के दुरुपयोग से,
अंतहीन विलास-भोग से,
पाशविक बल-प्रयोग से,
ग्रह-नक्षत्रों के दुर्योग से,

जब वह गिरा तो पुनः उठ पाया,
दुष्कर्मों ने उसे श्मशान पहुँचाया;
भाग्य ने श्री राम को निमित्त बनाया,
उसे तो उसके "मैं" ने ही मार गिराया

आइये हम इस "मैं" रूपी रावण को मारें,
श्री राम की शरण ले अपना जीवन सुधारें

3 comments:

  1. For all of you who are watching re-telecast of the serial Ramayana of Ramanand Sagar, today was Dussehra, as mighty Raavan was killed by Lord Rama. I have composed this poem not only to celebrate Dussehra in my own way but also to reiterate that Raavan was a symbol of evil which is present within us in one form or the other. Let's kill this evil.

    ReplyDelete
  2. बहुत ही सुंदर प्रस्तुति है श्रीमान आप की ।
    जय श्री राम

    ReplyDelete

64. दिन और रात

    दिन और रात का एक अजब सा नाता है एक न हो तभी दूसरा आता है   ।   जब आती है रात तो दिन छिप जाता ...