बिछ गयी राजनीति की चौसर,
मिल गया कौरवों को अवसर;
पड़ रहे थे शकुनी के पाँसे,
थम गयी थीं सभी की साँसें ।
हार कर अपना राज-पाट,
और द्रौपदी को दाँव में;
डाल ली पाँचों पाँडवों ने,
बेड़ियाँ स्वयं अपने पाँवों में ।
क्या चौसर खेलना ही था क्षत्रिय-धर्म?
क्या आवश्यक था यह घोर पाप-कर्म?
क्या राज-सभा में नहीं हुआ था अधर्म?
क्या छुआ था किसी ने द्रौपदी का मर्म?
कैसा अनीति-पूर्ण था वह समाज?
जहाँ चलता ही रहा ऐसा राज-काज,
बचाते रहे सब केवल अपना ताज,
कोई न उठा बचाने एक नारी की लाज ।
आ गये कृष्ण नहीं तो क्या होता?
दुःशासन के दुस्साहस पर जग रोता ।
चौसर के पाँसे लाये विपदा घनेरी,
बज उठी महायुध्द की भीषण रण-भेरी ।
कौरव हो चुके थे अन्याय का पर्याय,
पाँडवों ने तो केवल माँगा था न्याय ।
महाभारत का युध्द तो होना ही था,
मोह-ग्रस्त धृतराष्ट्र को तो रोना ही था,
दुष्टों को मृत्यु-निद्रा में तो सोना ही था,
धर्म को अधर्म पर विजयी तो होना ही था ।
महाभारत का युध्द तो आज भी है जारी,
पर आज पाँडवों पर कौरव पड़ रहे हैं भारी,
बढ़ गये हैं संसार में अन्यायी और दुराचारी,
काँप उठी है जिनके अधर्म से मानवता सारी ।
हे कृष्ण!
एक बार जग में फिर से आओ,
हर द्रौपदी की लाज बचाओ,
सबको धर्म का मार्ग दिखाओ,
जग में प्रेम-सुधा बरसाओ॥


The 'Cheer-haran' Scene was a turning point in Mahabharat which, ultimately, led to the war. Wasn't it avoidable if some elders had taken wise steps of kicking Shakuni out and disciplining Duryodhana? Unfortunately, this Mahabharat is still continuing in the world of the day and our misfortune is that the evil forces are winning over. Corona of the day is the result of such immoral behaviour. We don't have Lord Krishna in this yug to bring the evil-mongers to the book.
ReplyDeleteI sincerely hope that the reader will like the efforts. The poem is straight from a sad heart.
True teachings for today
ReplyDeleteबहुत अच्छा लिखते हैं
ReplyDeleteधन्यवाद
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