
उम्र के इस कँटीले मोड़ पर,
अनुभवों को निचोड़ कर,
जमा करी हैं कुछ
गठरियाँ ।
कुछ में
कस कर बाँध दी हैं
तल्ख़ियाँ;
तो
कुछ से
झाँक रही हैं
सुर्ख़ियाँ ।
कुछ से
छलक आते हैं
अधूरे अरमान
तो
कुछ में
छिपा दी है
अपनी पहचान ।
कुछ में
सिमट गयी हैं
यादें पुरानी
तो
कुछ में
रख दी है
बीती कहानी ।
कभी-कभी,
खुल जाती हैं
ये सारी
गठरियाँ
तो
निकल आती है
मेरी पहचान;
मचल उठते हैं
अधूरे अरमान ।
रुला देती हैं
तीख़ी तल्ख़ियाँ
तो
हँसा जाती हैं
सुर्ख़ सुर्ख़ियाँ ।
गुनगुनाती हैं
यादें सुहानी,
ला कर सामने
कोई
बीती कहानी ।
अब,
सिमट गया है
जीवन इन्ही
गठरियों में;
बस गया है
मन इन्ही
गठरियों में ॥

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