Sunday, 6 September 2020

63. गठरियाँ

 




उम्र के इस कँटीले मोड़ पर,

अनुभवों को निचोड़ कर,

जमा करी हैं कुछ

गठरियाँ ।


कुछ में

कस कर बाँध दी हैं

तल्ख़ियाँ;

तो

कुछ से

झाँक रही हैं

सुर्ख़ियाँ ।


कुछ से

छलक आते हैं

अधूरे अरमान

तो

कुछ में

छिपा दी है

अपनी पहचान ।


कुछ में

सिमट गयी हैं

यादें पुरानी

तो

कुछ में

रख दी है

बीती कहानी ।


कभी-कभी,

खुल जाती हैं

ये सारी

गठरियाँ

तो

निकल आती है

मेरी पहचान;

मचल उठते हैं

अधूरे अरमान ।


रुला देती हैं

तीख़ी तल्ख़ियाँ

तो

हँसा जाती हैं

सुर्ख़ सुर्ख़ियाँ ।


गुनगुनाती हैं

यादें सुहानी,

ला कर सामने

कोई

बीती कहानी ।


अब,

सिमट गया है

जीवन इन्ही 

गठरियों में;

बस गया है

मन इन्ही 

गठरियों में ॥ 



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