Thursday, 15 October 2020

63. चलो

 




चलो,

बोते हैं

कुछ काग़ज़-कलम

और

अक्षर उगाते हैं;


बहुत हो चुकी 

बातों की खेती,

अब बच्चों को

पढ़ाते हैं ।




छोटे-से सिर पर

ईंटों का बोझ 

ढोते ;


सुबह से रात तक

ढाबों में जूठन

बटोरते ;




गली-मुहल्लों में

गंदा कूड़ा-कचरा 

उठाते;


चमकते शहरों के

काले धंधों में बचपना 

गँवाते



ये मासूम

खो बैठे हैं 

बचपन अपना;


आँखें इनकी 

नहीं देखतीं

अब कोई सपना ।


सच तो ये है कि,

न मंदिर की 

घंटी में;

न मस्जिद की 

अज़ान में;


वो भगवान,

वो अल्लाह

तो बसता है

बस,

हर मासूम की

मुस्कान में ।


इसलिये,

बहुत हो चुकी 

बातों की खेती


चलो
,

एक नया सूरज

उगाते  हैं

इनकी दुनिया में भी

उजाला फैलाते हैं ।

चलो....




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