जब चलते हैं
मिसाइल,
और
गिरते हैं,
बम,
तो,
नहीं होते हैं
सिर्फ,
बन्दूकें और
टैंक खत्म ।
साथ में
खत्म
होते
हैं
अनगिनत जीवन
और
बुझ जाते
हैं
न जाने कितने
मन
।
ये उजाड़
देते
हैं
कितनों के
सुहाग;
कितने ही
जीवन
में
लगी रह
जाती
है
आग
।
कितने बच्चे
खो
देते
हैं
अपने सिर
से
साया;
कितने बुढ़ापों
का
लुट जाता
है
सरमाया ।
बन जाती
है
धरती
श्मशान;
हो जाते
हैं
हरे
खेत
वीरान ।
क्या,
नहीं बन
सकती
कोई ऐसी
मिसाइल,
जो,
खत्म कर
दे,
हमारे अन्दर
का
दानव;
और फिर
जगा दे
हमारे अन्दर
का
मानव ?
सोचिये,
कोई बच्चा
भूखा न
सो
पाये;
कोई नारी
पीड़ित न
हो
पाये;
हर बीमारी
का
इलाज हो
जाये,
हर चेहरे
पर
मुस्कान आ
जाये
।
झगड़ों के
फैसले
हों
सरहद के
बजाय
खेल के
मैदानों
में;
मधुर संगीत
गूँजे
घरों और
दूकानों
में
।
क्या,
कभी सच
हो
पायेगा,
हमारा ये
सपना;
क्या,
कभी सच
हो
पायेगा,
हमारा ये
सपना;
जब हर
किसी का होगा
हर कोई अपना ?
क्या.......


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