Saturday, 29 February 2020

दर्द



दर्द का
मेरे घर है
आना-जाना;
दर्द से तो
मेरा नाता है
पुराना ।

दर्द
अहसास देता है
जीने का;
मज़ा अलग है
दर्द को
पीने का ।

दर्द की
अलग-सी है
रिवायत;
दर्द की
भी
पड़ जाती है
आदत ।

दर्द से
तड़प जाता है
तन-मन
पर
दर्द के बाद
ही तो
जन्म पाता है
नया जीवन ।

दर्द का
बहुत बड़ा है
अहसान;
क्योंकि
दर्द में ही
याद आते हैं
भगवान ।

Wednesday, 29 January 2020

चिरायु भव




तुम्हारे जन्मदिन
की
शुभ-वेला पर
क्या-क्या
दूँ आशीष
तुम्हे ?

मन की है
भावना
कि
मिलता रहे
नीरोग का
वरदान सदा
तुम्हे ।

बना रहे
जग के
सभी कर्तव्यों का
बोध सदा
तुम्हे ।

मिलता रहे
यश और प्रशस्ति
का
पथ सदा
तुम्हे ।

करता हूँ प्रार्थना
कि
मिल जाये
बची-खुची
मेरी आयु भी
तुम्हे ।

Tuesday, 21 January 2020

मैं



मैं
फँसा हूँ
मृगमरीचिकाओं के
जाल में
अपनों की
चाल में,

भावनाओं के
भूचाल में,
बेवजह के
बवाल में।

आहत सा मन,
थका हुआ तन
सूनी डगर,
मंज़िल पर नज़र।

अनबुझी प्यास,
खुशी की तलाश।

शायद कोई मोड़ आए
जो
नया सवेरा लाये
शायद.......
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Sunday, 19 January 2020

मिलेगी शायद




स्याह-अँधेरी काली रात,
तेज़ मूसलाधार बरसात,
डरा रहा अंबर का शोर
कड़कती दामिनी चारों ओर ।

तर-बदर बदन,
भीगा-सा  मन
थके-थके पाँव,
ढूँढ रहे छाँव ।

दूर तक फैला मैदान,
बियाबान-सूनसान,
पगडंडी न रस्ता,
बोझ भरा बस्ता ।

कब तक उठेगा मुझसे?

तलाश है

एक ठाँव की,
चाँदनी के गाँव की

मिलेगी शायद .......
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शाम सर्दी की




शाम सर्दी की
लगती है उदास सी ।

भरी
ठंढे कुँहासे से,

लदी
घने अंधेरों से,

बढ़ाती
बोझ मन पर,

सुलगाती
अरमानों को,

टँगी  है
कटी पतंग सी ।

स्तब्धता
बन गई है गति
जीवन की ।

बढ़ते अंधेरों के बीच
रोशनी
चौंकाती है,
डराती है ।

सर्दी की शाम
शायद ठहरी है ।

रहने दो
मुझे अब अंधेरों में ही

खोने दो यहीं,
सोने दो यहीं ।

रात तो आनी
अभी बाकी है,

पर
नींद अब आती है,
नींद बहुत आती है ॥
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Friday, 17 January 2020

जन्मदिन










आज,
जुड़ रहा है
एक वर्ष नया
तुम्हारे जीवन में।

ये दे रहा 
संदेश नया
तुम्हारे जीवन में।

दूर भगा
निराशा को

ये करेगा,

आशा का
नव-संचार
तुम्हारे जीवन में।

है
सखा-सहचर की 
ये कामना,

मन से निकली 
है भावना

कि

आयें नये त्यौहार,
मिलें ढेरों उपहार,
नाचें खुशियाँ अपार,
और
झूमे बसंत-बहार

तुम्हारे जीवन में ॥

सूर्य


युगों से
प्राणों का
दाता है सूर्य ।

रात के
अंधियारे को
मिटाता है सूर्य ।

ऊषाकाल में
लालिमा
लाता है सूर्य ।

हमें
ऊर्जावान
बनाता है सूर्य ।

सहता है स्वयं का
भीषण ताप वह
पर
जग को
प्रकाश से
नहलाता है सूर्य ।

करता नहीं है
तनिक भी भेदभाव वह
सभी पर
कृपा बरसाता है सूर्य ।

मेघों से आच्छादित
अम्बर का
चीर कर अन्धेरा

ला कर
अपनी रश्मियाँ
बिखराता है सूर्य ।

प्रभु का वरदान है वह,
पावन और महान है वह,
इसीलिये अर्घ्य से
पूजा जाता है सूर्य ।

सूर्य है प्रतीक-

नियमों के
पालन का,


जीवन में
अनुशासन का,

मेघों में भी
न छुपने का,

ऊँचाइयों पर
चमकने का,

अपना ताप
स्वयं सह जाने का
पर
सभी के जीवन को
आलोकित कर जाने का ॥
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64. दिन और रात

    दिन और रात का एक अजब सा नाता है एक न हो तभी दूसरा आता है   ।   जब आती है रात तो दिन छिप जाता ...