कब चढ़ जाये फोटो पर माला,
कुछ पता नहीं !
कब जड़ जाये होठों पर ताला,
कुछ पता नहीं !
कब उजड़ जाये माँग का सिन्दूर,
कुछ पता नहीं !
कब हो जायें पापा बच्चों से दूर,
कुछ पता नहीं !
कब कट जाये राखी-बँधी कलाई,
कुछ पता नहीं !
कब छिन जाये माँ-बाप की लाठी,
कुछ पता नहीं !
बस जीना-मरना है तो वतन की खातिर,
इतना पता है इन्हे !
हँसते-खेलते कब आ जाये बुलावा,
कुछ पता नहीं !








