Sunday, 23 August 2020

62. कुछ पता नहीं !



कब चढ़ जाये फोटो पर माला,

कुछ पता नहीं !


कब जड़ जाये होठों पर ताला,

कुछ पता नहीं !


कब उजड़ जाये माँग का सिन्दूर,

कुछ पता नहीं !


कब हो जायें पापा बच्चों से दूर,

कुछ पता नहीं !


कब कट जाये राखी-बँधी कलाई,

कुछ पता नहीं !


कब छिन जाये माँ-बाप की लाठी,

कुछ पता नहीं !


बस जीना-मरना है तो वतन की खातिर,

इतना पता है इन्हे !


हँसते-खेलते कब आ जाये बुलावा, 

कुछ पता नहीं ! 

Sunday, 24 May 2020

आ जाओ न पापा



आज,

आई जो याद

पापा की;

 

तो फूट पड़ी

रुकी हुई 

एक सिसकी।

 

लगा ऐसा

जैसे

बहुत प्यार से

उन्होने बुलाया हो,

 

बैठा कर

अपने पास

बचपन को

फिर से दोहराया हो।

 

आई

कानों में वही आवाज़

चलो,

चॉक-बार खायेंगे

और

तुम्हे अच्छी सी

ड्रेस दिलायेंगे।

 

कर रहा है मन,

फिर से छोटी

हो जाऊँ;

खूब शरारत कर

उन्हे सताऊँ;

उछल-कूद कर

नाचूँ-गाऊँ;

उधम मचा कर

थोड़ी सी डाँट खाऊँ।

 

काश,

एक बार

तो आयें पापा;

देख मुझे सजा-सँवरा

सुख पायें पापा;

सहला कर

माथे को मेरे

मेंह,आशीषों की

बरसायें पापा।

 

एक बार,

बस,

एक बार,

आ जाओ न पापा॥

Friday, 15 May 2020

वो तेरह बरस की लड़की


 

क्या हुआ होगा,

जब

उस तेरह बरस की लड़की

को

कुछ गलीज़ हाथों ने

छुआ होगा,

घसीट कर

पटका होगा,

कपड़ों को

फाड़ा होगा,

मुँह को

दबाया होगा,

चीख को

घोटा होगा,

बदन को

नोचा होगा,

उसका खून

बहाया होगा,

बेहोश करके ही उसे

छोड़ा होगा

 

उस तेरह बरस की लड़की

का

अब क्या होगा?

क्या मौत ही अब

उसका रास्ता होगा?

 

नहीं, बिल्कुल नहीं,

 

उस तेरह बरस की लड़की

को

मरना नहीं

जीना होगा,

ज़हर के इस घूँट को

पीना होगा,

छोड़ अतीत को पीछे,

आगे निकलना होगा,

उठ कर

वेदना के भँवर से,

सतह पर आना होगा

 

बगैर छिपाये

अपना चेहरा 

उन चेहरों को

सामने लाना होगा

 

उस तेरह बरस की लड़की

को

हिम्मत की मिसाल

बनना होगा

और

संजो कर

अपने सपने,

जीवन-पथ पर

चलना होगा

 


Sunday, 19 April 2020

चल रहा है महाभारत



बिछ गयी राजनीति की चौसर,
मिल गया कौरवों को अवसर;
पड़ रहे थे शकुनी के पाँसे,
थम गयी थीं सभी की साँसें ।

हार कर अपना राज-पाट,
और द्रौपदी को दाँव में;
डाल ली पाँचों पाँडवों ने,
बेड़ियाँ स्वयं अपने पाँवों में ।

क्या चौसर खेलना ही था क्षत्रिय-धर्म? 
क्या आवश्यक था यह घोर पाप-कर्म?
क्या राज-सभा में नहीं हुआ था अधर्म?
क्या छुआ था किसी ने द्रौपदी का मर्म?

कैसा अनीति-पूर्ण था वह समाज?
जहाँ चलता ही रहा ऐसा राज-काज,
बचाते रहे सब केवल अपना ताज,
कोई न उठा बचाने एक नारी की लाज ।

आ गये कृष्ण नहीं तो क्या होता?
दुःशासन के दुस्साहस पर जग रोता ।

चौसर के पाँसे लाये विपदा घनेरी,
बज उठी महायुध्द की भीषण रण-भेरी ।
कौरव हो चुके थे अन्याय का पर्याय, 
पाँडवों ने तो केवल माँगा था न्याय ।

महाभारत का युध्द तो होना ही था,
मोह-ग्रस्त धृतराष्ट्र को तो रोना ही था,
दुष्टों को मृत्यु-निद्रा में तो सोना ही था,
धर्म को अधर्म पर विजयी तो होना ही था ।

महाभारत का युध्द तो आज भी है जारी,
पर आज पाँडवों पर कौरव पड़ रहे हैं भारी,
बढ़ गये हैं संसार में अन्यायी और दुराचारी,
काँप उठी है जिनके अधर्म से मानवता सारी ।

हे कृष्ण! 

एक बार जग में फिर से आओ,
हर द्रौपदी की लाज बचाओ,
सबको धर्म का मार्ग दिखाओ,
जग में प्रेम-सुधा बरसाओ॥  

Saturday, 18 April 2020

रावण


स्वर्णपुरी का अधिष्ठाता,
था चारों वेदों का  ज्ञाता;

परम तपस्वी और मनस्वी,
था वह अत्यन्त ही तेजस्वी;

शिव का वह परम उपासक,
था वह बहुत ही वीर शासक;

प्रताप से गूँजा दिग-दिगन्त,
था नहीं उसके शौर्य का अन्त;

परन्तु

निर्लज्ज व्यवहार से,
कुत्सित दुराचार से,
पथभ्रष्ट अहंकार  से,
भीषण अत्याचार से,

तंत्र-मंत्र के दुरुपयोग से,
अंतहीन विलास-भोग से,
पाशविक बल-प्रयोग से,
ग्रह-नक्षत्रों के दुर्योग से,

जब वह गिरा तो पुनः उठ पाया,
दुष्कर्मों ने उसे श्मशान पहुँचाया;
भाग्य ने श्री राम को निमित्त बनाया,
उसे तो उसके "मैं" ने ही मार गिराया

आइये हम इस "मैं" रूपी रावण को मारें,
श्री राम की शरण ले अपना जीवन सुधारें

Monday, 13 April 2020

कुछ अनाम से चेहरे

महायुध्द हो या महामारी
भूकम्प हो या कोई बीमारी,
भूख, गरीबी और बेकारी
पिसती है जनता ही बेचारी

घिर जाते हैं
कुछ अनाम से चेहरे
बिखर जाते हैं
उनके सपने सुनहरे;

वे सपने होते हैं
आने वाले कल के
और उसके
हर एक पल के;

पर,
कहाँ हो पाते हैं
उनके सपने पूरे ?
कुछ हो जाते हैं गुम
कुछ रह जाते अधूरे

उन अनाम से चेहरों को
कोई नहीं पहचानता,
उनका बलिदान
कोई भी है जानता

आइये करें उनका सम्मान
और दें उन्हे उचित स्थान;
ये अनाम से चेहरे ही हैं
सच्चे तौर पर महान ।

Thursday, 9 April 2020

बढ़ता चला जाता हूँ....


दुःसह दुःखों के भार ने,
मुश्किलों के अम्बार ने,
लिये खूब इम्तहान,
किया बहुत परेशान

लोगों की तीख़ी हँसी थी,
बढ़ती सी बेबसी थी,
पर,
खुद झुका, घुटने टेके,
बीते पल मुड़ कर देखे

रास्तों की करी तलाश,
जगा कर अपना विश्वास,
बस,
हिम्मत ने दिया साथ
किस्मत ने थामा हाथ

फिर,
आया एक मोड़,
पाया रोशनी का छोर।
आहिस्ते-आहिस्ते
खुलते गये रास्ते

अब,
गया है,
धूप को सहना
और
तूफाँ से लड़ना

भूल चुका हूँ
सब का छलावा,
पिघल चुका है
मन का लावा

उससे बने गीतों को
गाता-गुनगुनाता हूँ,
और हँसता-मुस्कुराता
बढ़ता चला जाता हूँ


64. दिन और रात

    दिन और रात का एक अजब सा नाता है एक न हो तभी दूसरा आता है   ।   जब आती है रात तो दिन छिप जाता ...