Saturday, 12 September 2020

65. पता नहीं कब...

 


 












पता नहीं कब

अपनी छाँव में सुलाने

उसे दबे पाँव आना हो?

 

पता नहीं कब

आँसुओं के सैलाब में से

निकल जाना हो?

 

पता नहीं कब

अन्तिम गीत

गाना हो?

 

पता नहीं कब

उस 'अपने' के पास

पहुँच जाना हो?

 

पता नहीं कब...

 

बस,

कर जाऊँ

ज़िम्मेदारियाँ पूरी,

भले ही रह जायें

कुछ ख्वाहिशें अधूरी ।

 

छोड़ जाऊँ पीछे

खुशनुमा यादें,

कर पाऊँ पूरे

किये हुए वादे

 

पता नहीं कब...

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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