Saturday, 12 September 2020

66.तय है...



 

तय है

मौत का आना एक दिन

पर

क्या डर कर

हम जीना छोड़ दें?

 

तय है...

पर

क्यों बढ़

जीवन में हर बूँद

ज्ञान की निचोड़ लें?

 

तय है...

पर

क्यों कर

हर कोशिश

धारा को मोड़ लें?

 

तय है...

पर

क्यों

सारे सुख

आज के बटोर लें?

 

तय है...

पर

क्यों एक

नई धुन

जीवन में जोड़ लें?

 

 


65. पता नहीं कब...

 


 












पता नहीं कब

अपनी छाँव में सुलाने

उसे दबे पाँव आना हो?

 

पता नहीं कब

आँसुओं के सैलाब में से

निकल जाना हो?

 

पता नहीं कब

अन्तिम गीत

गाना हो?

 

पता नहीं कब

उस 'अपने' के पास

पहुँच जाना हो?

 

पता नहीं कब...

 

बस,

कर जाऊँ

ज़िम्मेदारियाँ पूरी,

भले ही रह जायें

कुछ ख्वाहिशें अधूरी ।

 

छोड़ जाऊँ पीछे

खुशनुमा यादें,

कर पाऊँ पूरे

किये हुए वादे

 

पता नहीं कब...

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Tuesday, 8 September 2020

64. सच्चाइयाँ

 

Selfish People: Best ways to deal with selfish people - lifealth

उगते सूरज को

शीश नवायेंगे; 

पर 

लग गया ग्रहण

तो

निगाह चुरायेंगे ।



टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर

मोड़ आयेंगे; 

पर,

अगर गिर गये

तो

बच कर निकल जायेंगे ।


अगर तेज़ चले  

तो

टकरा जायेंगे 

पर,

बढ़ गये आगे 

तो

पीछे खींच लायेंगे ।


इसलिये,

मत करो किसी की 

परवाह;

ये अपना राग सुनायेंगे

जब नहीं सुनोगे

तो

खुद चुप हो जायेंगे ॥




 




Sunday, 6 September 2020

63. गठरियाँ

 




उम्र के इस कँटीले मोड़ पर,

अनुभवों को निचोड़ कर,

जमा करी हैं कुछ

गठरियाँ ।


कुछ में

कस कर बाँध दी हैं

तल्ख़ियाँ;

तो

कुछ से

झाँक रही हैं

सुर्ख़ियाँ ।


कुछ से

छलक आते हैं

अधूरे अरमान

तो

कुछ में

छिपा दी है

अपनी पहचान ।


कुछ में

सिमट गयी हैं

यादें पुरानी

तो

कुछ में

रख दी है

बीती कहानी ।


कभी-कभी,

खुल जाती हैं

ये सारी

गठरियाँ

तो

निकल आती है

मेरी पहचान;

मचल उठते हैं

अधूरे अरमान ।


रुला देती हैं

तीख़ी तल्ख़ियाँ

तो

हँसा जाती हैं

सुर्ख़ सुर्ख़ियाँ ।


गुनगुनाती हैं

यादें सुहानी,

ला कर सामने

कोई

बीती कहानी ।


अब,

सिमट गया है

जीवन इन्ही 

गठरियों में;

बस गया है

मन इन्ही 

गठरियों में ॥ 



Sunday, 23 August 2020

62. कुछ पता नहीं !



कब चढ़ जाये फोटो पर माला,

कुछ पता नहीं !


कब जड़ जाये होठों पर ताला,

कुछ पता नहीं !


कब उजड़ जाये माँग का सिन्दूर,

कुछ पता नहीं !


कब हो जायें पापा बच्चों से दूर,

कुछ पता नहीं !


कब कट जाये राखी-बँधी कलाई,

कुछ पता नहीं !


कब छिन जाये माँ-बाप की लाठी,

कुछ पता नहीं !


बस जीना-मरना है तो वतन की खातिर,

इतना पता है इन्हे !


हँसते-खेलते कब आ जाये बुलावा, 

कुछ पता नहीं ! 

Sunday, 24 May 2020

आ जाओ न पापा



आज,

आई जो याद

पापा की;

 

तो फूट पड़ी

रुकी हुई 

एक सिसकी।

 

लगा ऐसा

जैसे

बहुत प्यार से

उन्होने बुलाया हो,

 

बैठा कर

अपने पास

बचपन को

फिर से दोहराया हो।

 

आई

कानों में वही आवाज़

चलो,

चॉक-बार खायेंगे

और

तुम्हे अच्छी सी

ड्रेस दिलायेंगे।

 

कर रहा है मन,

फिर से छोटी

हो जाऊँ;

खूब शरारत कर

उन्हे सताऊँ;

उछल-कूद कर

नाचूँ-गाऊँ;

उधम मचा कर

थोड़ी सी डाँट खाऊँ।

 

काश,

एक बार

तो आयें पापा;

देख मुझे सजा-सँवरा

सुख पायें पापा;

सहला कर

माथे को मेरे

मेंह,आशीषों की

बरसायें पापा।

 

एक बार,

बस,

एक बार,

आ जाओ न पापा॥

Friday, 15 May 2020

वो तेरह बरस की लड़की


 

क्या हुआ होगा,

जब

उस तेरह बरस की लड़की

को

कुछ गलीज़ हाथों ने

छुआ होगा,

घसीट कर

पटका होगा,

कपड़ों को

फाड़ा होगा,

मुँह को

दबाया होगा,

चीख को

घोटा होगा,

बदन को

नोचा होगा,

उसका खून

बहाया होगा,

बेहोश करके ही उसे

छोड़ा होगा

 

उस तेरह बरस की लड़की

का

अब क्या होगा?

क्या मौत ही अब

उसका रास्ता होगा?

 

नहीं, बिल्कुल नहीं,

 

उस तेरह बरस की लड़की

को

मरना नहीं

जीना होगा,

ज़हर के इस घूँट को

पीना होगा,

छोड़ अतीत को पीछे,

आगे निकलना होगा,

उठ कर

वेदना के भँवर से,

सतह पर आना होगा

 

बगैर छिपाये

अपना चेहरा 

उन चेहरों को

सामने लाना होगा

 

उस तेरह बरस की लड़की

को

हिम्मत की मिसाल

बनना होगा

और

संजो कर

अपने सपने,

जीवन-पथ पर

चलना होगा

 


64. दिन और रात

    दिन और रात का एक अजब सा नाता है एक न हो तभी दूसरा आता है   ।   जब आती है रात तो दिन छिप जाता ...