Thursday, 15 October 2020

63. चलो

 




चलो,

बोते हैं

कुछ काग़ज़-कलम

और

अक्षर उगाते हैं;


बहुत हो चुकी 

बातों की खेती,

अब बच्चों को

पढ़ाते हैं ।




छोटे-से सिर पर

ईंटों का बोझ 

ढोते ;


सुबह से रात तक

ढाबों में जूठन

बटोरते ;




गली-मुहल्लों में

गंदा कूड़ा-कचरा 

उठाते;


चमकते शहरों के

काले धंधों में बचपना 

गँवाते



ये मासूम

खो बैठे हैं 

बचपन अपना;


आँखें इनकी 

नहीं देखतीं

अब कोई सपना ।


सच तो ये है कि,

न मंदिर की 

घंटी में;

न मस्जिद की 

अज़ान में;


वो भगवान,

वो अल्लाह

तो बसता है

बस,

हर मासूम की

मुस्कान में ।


इसलिये,

बहुत हो चुकी 

बातों की खेती


चलो
,

एक नया सूरज

उगाते  हैं

इनकी दुनिया में भी

उजाला फैलाते हैं ।

चलो....




Tuesday, 13 October 2020

62. क्या?

 



 


जब चलते हैं

मिसाइल,

और

गिरते हैं,

बम,

तो,

नहीं होते हैं

सिर्फ,

बन्दूकें और

टैंक खत्म ।

 

साथ में खत्म होते हैं

अनगिनत जीवन

और

बुझ जाते हैं

जाने कितने मन

 

ये उजाड़ देते हैं

कितनों के सुहाग;

कितने ही जीवन में

लगी रह जाती है आग

 

कितने बच्चे खो देते हैं

अपने सिर से

साया;

कितने बुढ़ापों का

लुट जाता है

सरमाया

 

बन जाती है धरती

श्मशान;

हो जाते हैं हरे खेत

वीरान

 

क्या,

नहीं बन सकती

कोई ऐसी मिसाइल,

जो,

खत्म कर दे,

हमारे अन्दर का

दानव;


और फिर

जगा दे

हमारे अन्दर का

मानव ?

 

सोचिये,

कोई बच्चा

भूखा सो पाये;

कोई नारी

पीड़ित हो पाये;

हर बीमारी का

इलाज हो जाये,

हर चेहरे पर

मुस्कान जाये

 

झगड़ों के फैसले हों

सरहद के बजाय

खेल के मैदानों में;

मधुर संगीत गूँजे

घरों और दूकानों में

 

क्या,

कभी सच हो पायेगा,

हमारा ये सपना;

क्या,

कभी सच हो पायेगा,

हमारा ये सपना;

जब हर किसी का होगा

हर कोई अपना ?

 

क्या.......



 

Monday, 21 September 2020

कृति का जन्मदिन (27-09-2020)

 





एक माँ को

तो

खोया है मैंने,

पर

दो माँओं को

पाया है;

एक हैभूमिका’

दूजी को जग ने

‘कृति’ बुलाया है

 

एक माँ को...

 

हूँ तो,

मैं  पिता उनका

पर अब,

उनमें अभिभावक

पाया है

उनके रूप में सामने

शायद पुण्यों का प्रतिफल

आया है

 

एक माँ को...

 

सभी बेटों और बेटियों ने

हम सब का मान

बढ़ाया है,

इस आयु में आकर

अब, हम पर उनकी

छाया है ।

 

करते हैं अब,

बातकृति’ की,

उसके जन्मदिन का

त्योहार  जो

आया है ;

जन्म से अब तक

सबने पूरे हर्षोल्लास से 

मनाया है

 

देने के लिए

ये अकिंचन

एक छोटी-सी पोटली

लाया है;

जिसमें,

ढेर-सा लाड़-दुलार,

और

आशीषों का अम्बार

समाया है।

 

मिलें उसे,

सुख-समृध्दि

असीम अपार;

सब अपनों का

निरंतर प्यार;

सखा-सहचर से

अनवरत साज-श्रृंगार;

और

उसके घर-संसार को

एक सुंदर-सा विस्तार ।

 

यही माँगने को

प्रभु-चरणों में

अब ये शीश

नवाया है ॥

==========

 

 

 

 

 

 

 


Saturday, 12 September 2020

66.तय है...



 

तय है

मौत का आना एक दिन

पर

क्या डर कर

हम जीना छोड़ दें?

 

तय है...

पर

क्यों बढ़

जीवन में हर बूँद

ज्ञान की निचोड़ लें?

 

तय है...

पर

क्यों कर

हर कोशिश

धारा को मोड़ लें?

 

तय है...

पर

क्यों

सारे सुख

आज के बटोर लें?

 

तय है...

पर

क्यों एक

नई धुन

जीवन में जोड़ लें?

 

 


65. पता नहीं कब...

 


 












पता नहीं कब

अपनी छाँव में सुलाने

उसे दबे पाँव आना हो?

 

पता नहीं कब

आँसुओं के सैलाब में से

निकल जाना हो?

 

पता नहीं कब

अन्तिम गीत

गाना हो?

 

पता नहीं कब

उस 'अपने' के पास

पहुँच जाना हो?

 

पता नहीं कब...

 

बस,

कर जाऊँ

ज़िम्मेदारियाँ पूरी,

भले ही रह जायें

कुछ ख्वाहिशें अधूरी ।

 

छोड़ जाऊँ पीछे

खुशनुमा यादें,

कर पाऊँ पूरे

किये हुए वादे

 

पता नहीं कब...

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Tuesday, 8 September 2020

64. सच्चाइयाँ

 

Selfish People: Best ways to deal with selfish people - lifealth

उगते सूरज को

शीश नवायेंगे; 

पर 

लग गया ग्रहण

तो

निगाह चुरायेंगे ।



टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर

मोड़ आयेंगे; 

पर,

अगर गिर गये

तो

बच कर निकल जायेंगे ।


अगर तेज़ चले  

तो

टकरा जायेंगे 

पर,

बढ़ गये आगे 

तो

पीछे खींच लायेंगे ।


इसलिये,

मत करो किसी की 

परवाह;

ये अपना राग सुनायेंगे

जब नहीं सुनोगे

तो

खुद चुप हो जायेंगे ॥




 




Sunday, 6 September 2020

63. गठरियाँ

 




उम्र के इस कँटीले मोड़ पर,

अनुभवों को निचोड़ कर,

जमा करी हैं कुछ

गठरियाँ ।


कुछ में

कस कर बाँध दी हैं

तल्ख़ियाँ;

तो

कुछ से

झाँक रही हैं

सुर्ख़ियाँ ।


कुछ से

छलक आते हैं

अधूरे अरमान

तो

कुछ में

छिपा दी है

अपनी पहचान ।


कुछ में

सिमट गयी हैं

यादें पुरानी

तो

कुछ में

रख दी है

बीती कहानी ।


कभी-कभी,

खुल जाती हैं

ये सारी

गठरियाँ

तो

निकल आती है

मेरी पहचान;

मचल उठते हैं

अधूरे अरमान ।


रुला देती हैं

तीख़ी तल्ख़ियाँ

तो

हँसा जाती हैं

सुर्ख़ सुर्ख़ियाँ ।


गुनगुनाती हैं

यादें सुहानी,

ला कर सामने

कोई

बीती कहानी ।


अब,

सिमट गया है

जीवन इन्ही 

गठरियों में;

बस गया है

मन इन्ही 

गठरियों में ॥ 



64. दिन और रात

    दिन और रात का एक अजब सा नाता है एक न हो तभी दूसरा आता है   ।   जब आती है रात तो दिन छिप जाता ...