चलो,
बोते हैं
कुछ काग़ज़-कलम
और
अक्षर उगाते हैं;
बहुत हो चुकी
बातों की खेती,
अब बच्चों को
पढ़ाते हैं ।
छोटे-से सिर पर
ईंटों का बोझ
ढोते ;
सुबह से रात तक
ढाबों में जूठन
बटोरते ;
गली-मुहल्लों में
गंदा कूड़ा-कचरा
उठाते;
चमकते शहरों के
काले धंधों में बचपना
गँवाते
ये मासूम
खो बैठे हैं
बचपन अपना;
आँखें इनकी
नहीं देखतीं
अब कोई सपना ।
सच तो ये है कि,
न मंदिर की
घंटी में;
न मस्जिद की
अज़ान में;
वो भगवान,
वो अल्लाह
तो बसता है
बस,
हर मासूम की
मुस्कान में ।
इसलिये,
बहुत हो चुकी
बातों की खेती
चलो,
एक नया सूरज
उगाते हैं
इनकी दुनिया में भी
उजाला फैलाते हैं ।
चलो....










